कबीरपंथी

बीर ने हर धार्मिक ढकोसले का विरोध किया
और अपने आप को कबीरपंथी कहने वाले कुछ गवार लोग
सत्संग में मगन होते जा रहे हैं कबीर क नाम पे ही
निकम्मे निट्ठले गुरु बाबाओ की भी फ़ौज बनाते जा रहे हैं
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मुंडन के बाल गंगा में डालने को नाटक कहते हैं- सही है
पर उन्ही बालो को आटे में संजो के रख लेते हैं!
दूसरा बचा पैदा होगा क्या आटे से ?

रिश्ते और विश्वगुरु

अनजान लड़की बहन/दीदी बना दी जाती है
अनजान लड़का भाई/भईया बना दिया जाता है

सोच कभी इन बेमतलब के रिश्तो से आगे गयी नही इनकी और विश्वगुरु बनेंगे
लड़की की इज़्ज़त तभी करोगे जब उसके भाई बनोगे? बहना बनके ही इज़्ज़त होती है?
इंसान समझ लो एक दूसरे को ,, बस यही बहोत है बेशर्मो

सोच सुधारो, देश बाद में सुधार लेना

जनता और रोष

जितनी सक्रियता और रोष, घटना होने के बाद दिखाती है जनता
उतनी सतर्कता पहले दिखाए, तो घटना ही न हो
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